Monday, 19 December 2016

अंडमान वाया बनारस : श्रीप्रकाश शुक्ल के यात्रा संस्मरण के बहाने


अंडमान वाया बनारस
“यात्रायें यात्री को निःशब्द कर देती हैं किन्तु उनके समापन पर वो कहानीकार बन जाता है”- इब्न बतूता”  
         
ऐसी ही कहानी है ‘अंडे से अंडमान’ l यह यात्रा संस्मरण चर्चित कवि श्रीप्रकाश शुक्ल का है,जो ‘नया ज्ञानोदय’ के दिसंबर अंक में प्रकाशित है l यात्रायें हमारे मिजाज़ को एक नए तरीके से परिष्कृत करती है l यह हमारे मनोजगत के भावों को बदल देती हैं l कई बार यात्राएँ हमारी बनी बनायी अवधारणाओं को आद्यांत बदल देती हैं l उद्विग्न कवि मन को कविता से ज्यादा उसका भूगोल और इतिहास चुनौती देता है l अगर यात्राएँ मानसिक सुकून और मौज मस्ती का कारण हैं तो यही यात्राएँ कभी नहीं समाप्त होने वाली बेचैनी में भी तब्दील हो जाती हैं l यात्रा वृत्त हमारे समय और समाज के जीवंत दस्तावेज़ होते हैं l कवि श्रीप्रकाश शुक्ल ऐतिहासिकता के साथ अपने भौगोलिकता को रेखांकित करने वाले कवि हैं l ऐसे में उनके संस्मरणों में इतिहास और भूगोल की अनुगूंजें स्वाभाविक हैं l कवि मन का संघर्ष उसके समय और समाज का संघर्ष भी होता है l बात अंडमान की हो तो अनायास ही मानवीय त्रासदी, साम्राज्यवादी शोषण, गुलामी की पशुवत जीवन के चित्र अंकित होने लगते हैं l अंडमान न केवल भारत बल्कि मनुष्य के स्वतन्त्र होने की जद्दोजहद के संघर्ष की कहानी कहता है l ऐसे दास्तानगोई  अंडमान में एक संवेदन कवि ह्रदय का प्रवेश और उसका वर्णन ‘अंडे से अंडमान’ में होता है l समकालीन कविता ने गद्य के घरौंदे में सेंध लगाई है l यह कोई नयी बात नहीं बल्कि पुरातन परम्परा से आयातित है l जिसे महाकाव्यों में देखा जा सकता है l समकालीन कविता से सम्बंधित व्यक्ति गद्य लिखेगा तो वह कवित्वपूर्ण होगा ही l ‘अंडे से अंडमान’ की खासियत उसके कथा प्रवाह में कवित्व का समायोजन है l  संस्मरण का पहला हिस्सा यात्रा पर  निकलने की कवि की तैयारी है l ‘यात्रा में घर’ उपशीर्षक में कविमन की घबराहट घर को लेकर है l इसमें वो घर पर एक कविता लिखते हैं l  घर को लेकर ‘चर्चित कवि विनोद कुमार शुक्ल’ की कविता और कवि श्रीप्रकाश शुक्ल की कविता दोनों घर को देखने की बेचैनी और घरवापसी से सम्बंधित है l यह घरवापसी आज के सन्दर्भों से अलग घर के रूमानियत से जुड़ती है l देखने और झांकने की क्रियाएं इन कविताओं में मौजूद है l दोनों कविताओं से गुजरें-
“दूर से अपना घर देखना चाहिए
मजबूरी में न लौट सकने वाली दूरी से अपना घर
कभी लौट सकेंगे की पूरी आशा में
सात समंदर पार चले जाना चहिये
जाते जाते पलटकर देखना चाहिए
दूसरे देश से अपना देश
अंतरिक्ष से अपनी पृथ्वी
तब घर में बच्चे क्या करते होंगे की याद
पृथ्वी में बच्चे क्या करते होंगे की याद
घर में अन्न जल होगा की नहीं की चिंता
पृथ्वी में कोई भूखा
घर में कोई भूखा जैसा होगा
और पृथ्वी की तरफ लौटना
घर की तरफ लौटने जैसा

घर का हिसाब किताब इतना गड़बड़ है
कि थोड़ी दूर पैदल जाकर घर की तरफ लौटता हूँ
जैसे पृथ्वी की तरफ l”
(विनोद कुमार शुक्ल, दूर से अपना घर देखना चाहिए)
और
                        “जब घर पर होते हैं
                        जब घर से बाहर निकलते का मन करता है
                        जब घर से बाहर निकलते हैं  
घर लौटने को मचल उठते हैं
घर के भीतर ही हमारी दुनिया है
और हम समझते हैं हम घर से दूर हैं
और बहुत बाहर भी
दूरी असल में कुछ नहीं होती
सिवाय इसके की हम घर के बाहर से घर के भीतर झाँकतें हैं
और बेचैन हो उठते हैं l”
(श्रीप्रकाश शुक्ल, अंडे से अंडमान संस्मरण से)







देखना समग्रता को व्यक्त करता है लेकिन झांकना बालसुलभ क्रिया है l जहाँ घर को लेकर एक मनुहार है l एक खिलंदड चाह l विनोद कुमार शुक्ल के घर को देखने में अंतरिक्ष की भव्यता है और पृथ्वी की विशालता, लेकिन श्रीप्रकाश शुक्ल का घर उनकी दुनिया है जहाँ जीने की न्यूनतम सामग्री है l घर उनके लिए स्मृति है l घर से दूर भी उनका घर उनके साथ है l ‘यात्रा में घर’ को पढने से पता चलता है कि यात्रा संस्मरणकार यात्रा में जाने से पहले कितनी तैयारी करते हैं चाहे वह मानसिक स्तर पर हो अथवा उसके ऐतिहासिक, भौगोलिक या साहित्यिक पक्ष को समेटने के स्तर पर l वे लिखते हैं- “यूँ तो इस कालापानी की यात्रा की तैयारी जून में ही कर ली थी , लेकिन जैसे-जैसे २० अक्टूबर का समय नजदीक आ रहा था,पत्नी और बच्चों की तैयारी हेतु कपडा इत्यादि की अपेक्षित हलचल बढ़ने लगी थी, जबकि मैं इस जगह से जुड़ी पुस्तकों को खरीदने में या पढने में व्यस्त था l”३ 
काला पानी का उजला सच
यात्रा संस्मरण का अगला हिस्सा ‘काला पानी का उजला सच’ है l इस हिस्से में कवि जीने और जानने के द्वंद्व के बीच की यात्रा करता है l वे लिखते हैं-
                        काला पानी काला पानी
                        बोल करियवा कैसा पानी
                        बाबा बोलें मन भर पानी
                        देख फिरंगिया उजला पानी !
इस खंड में यात्रा संस्मरणकार सेलुलर जेल की त्रासदियों का चित्रण करते हैं l “सेलुलर जेल में बंद कैदियों के तेल पेरने, नारियल के रेशे से रस्सी बनाने, हथौड़ा चलाने और पीठ पर मर्मान्तक कोड़ों के पड़ने की आवाज आ रही थी l बाहर से शांत मेरा मन भीतर से बहुत विचलित हो रहा था और सत्ता की क्रूरता व नेताओं के बयानों से मेरा मन बहुत आक्रोशित हो रहा था l” इसी हिस्से में लेखक अपने समय और समाज के वर्तमान को भी रेखांकित करते हैं l ग़ालिब के सुर में सुर मिलाते हुए वे आज के सत्तासीनों से पूछते हैं-
                        तेरी वफ़ा से क्या हो लताफी की दहर में
                        तेरी सिवा भी हमपे बहुत से सितम हुए l
सेलुलर जेल की यातना और चीखों को वे अपनी कविताओं में दर्ज करते हैं l इन कविताओं में कराहते पुरखों की आह और उनके आँखों में शांत समुद्र का हाहाकार और जिद अभिव्यक्त होता है l यह जिद अपने माटी के लिए था l यही वह माटी थी जिसने उन्हें अमानवीयता के क्रूरतम क्षणों में भी जीवित किये हुए थी l
                        ‘यातना एक ज़िद है
                        जो यातना में होता है वह बहुत ज़िद्दी होता है
                        जैसे की हमारे पुरखे
                        जिनकी जिद ही उन असंख्य घावों के लिए मरहम थी
                        तो तब मिले थे जब वे
                        काला पानी की काल कोठरी से अपनी माटी को पुकार रहे थे l”
इस खंड में यात्रा संस्मारणकार बेहद वर्णनात्मक हो गये हैं l यह वर्णन उनकी बेटी दर्शिता के प्रश्नों के फलस्वरूप हुआ है l इस कथा की सूत्रधार दर्शिता है l वह अपने प्रश्नों से कथा को एक गति प्रदान करती है l यात्रा संस्मरण में यह वर्णन बोझिल नहीं बल्कि उस यात्रा की ऐतिहासिकता और तमाम सूचनात्मक जानकारी के सम्पूर्ण है l यह वर्णात्मकता कथा प्रवाह को बनाये रखती है l इस वर्णन में आख्यान है और कवि की अपनी व्याख्याएं, जिसके माध्यम से कवि  उस जगह को समझता है l उसके अपने इंटरपटेशन हैं l जिसमें यथार्थ भी है और गल्प भी l यहाँ पाठक का दायित्व बढ़ जाता है कि इसमें उसको क्या लेना है l यथार्थ और गल्प का यह मेल ‘ज्ञानात्मक संवेदन और संवेदनात्मक ज्ञान’ का सहमेल है l
‘सेल का सानिध्य’  में सेलुलर जेल की यातना अभिव्यक्त हुई है l असल में अंडमान का इतिहास सेलुलर जेल का इतिहास है और इस जेल का इतिहास भारतीय क्रांतिकारियों के जज़्बे का इतिहास है l इसी लिए इस जेल के कैदी और वीर सावरकर के बड़े भई गणेश सावरकर अपनी एक कविता में इसे महातीर्थ कहते हैं l
                        “यह तीर्थ महातीर्थों का है
                        मत कहो इसे काला पानी
                        तुम सुनो यहाँ की धरती की
                        कण कण से गाथा बलिदानी l”
इसमें कवि जेल के कैदी भान सिंह से मिलने का बड़ा ही मर्मस्पर्शी वर्णन किया है l यह है तो गप्प लेकिन जेलर बेरी की यातना को यह बहुत सूक्ष्मता से दिखाता है l
                        “मुझेदेखो मैं ही हूँ भान सिंह...यही है मेरी सेल जहाँ कैद कर मुझे जेलर बेरी ने इतना मारा कि पानी भी नहीं मांग सका !”
            ‘हवा में हैवलोक’  में समुद्र के समुद्रपन का रेखांकन है l ‘विरासत में बाराटांग’ जारवा के रिश्तों को समझने और जारवा के जीवन के मिथकों को समझने के लिए ‘जारवा लेकिन हमारे जैसे हैं !’ को पढ़ा जाना चाहिए l इस खंड में भारत सरकार के आजतक के विकास कार्यों की झलक भी देख सकते हैं l ‘अंडे से अंडमान’ का यह यात्रा संस्मरण रोचक और जानकारी की दृष्टि से समृद्ध है l इसे पढ़ा जाना चाहिए l यात्रा संस्मरण कई बार हमें मानसिक यात्रायें कराते हैं l इस संस्मरण के माध्यम से हम ना केवल अंडमान की यात्रा करते हैं बल्कि कवि की आँखों से उसकी संवेदना को समझते भी है l अंडमान को समझना ‘अपने पुरखों की जमीन का पथिक’ होना है l अन्ततः रचनाकार अपनी परम्पराओं के प्रति कृतज्ञ होते हैं l ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ के मूल्य पर कवि इस यात्रा संस्मरण का पटाक्षेप करते हैं अगली यात्रा की तैयारी के उम्मीद में l
                        “दुनिया भर के संतुलन को बचाने वाले ऐ जल पुरुष !
                        अपने संततियों की हर लुटेरों से रक्षा करना
                        और उन सभी विकास मान प्राणियों का मान रखना
                        जो आदिम असभ्यता में
                        तुम्हारे नरक की गरमी से
                        सभ्य होते गए हैं !”  
 अंत में अपनी ओर से यह यात्रा संस्मरण पढने में गद्य से ज्यादा कविता सा रस प्रदान करता है l कवि श्रीप्रकाश शुक्ल की खासियत है कि उनका गद्य भी कवित्वपूर्ण होता है l परम्परा और आधुनिकता का सहमेल उनकी कविताओं के अलावा उनके विचार, आलोचना और जीवन में भी आता है जिसे सहज ही यहाँ देखा जा सकता है l यह संस्मरण आपके अंडमान यात्रा को एक नया आयाम दे इसी कामना के साथ कवि की ओर से ग़ालिब के शेर से इस टिप्पणी का समापन कर रहा हूँ l
                        तोड़ बैठे जबकि हम जामो-सुबू फिर हमको क्या
आसमां से बादा-ए-गुलफ़ाम गो बरसा करे l  
__________________
सन्दर्भ ग्रन्थ
१.     शुक्ल विनोद कुमार, प्रतिनिधि कविताएँ , पृष्ठ संख्या- ४८, राजकमल प्रकाशन, नयी दिल्ली
२.     शुक्ल श्रीप्रकाश, अंडे से अंडमान, नया ज्ञानोदय, दिसंबर २०१६, पृष्ठ संख्या- २२, भारतीय ज्ञानपीठ, नयी दिल्ली
३.     शुक्ल श्रीप्रकाश, अंडे से अंडमान, नया ज्ञानोदय, दिसंबर २०१६, पृष्ठ संख्या- २३, भारतीय ज्ञानपीठ, नयी दिल्ली
४.     शुक्ल श्रीप्रकाश, अंडे से अंडमान, नया ज्ञानोदय, दिसंबर २०१६, पृष्ठ संख्या- २३, भारतीय ज्ञानपीठ, नयी दिल्ली
५.     शुक्ल श्रीप्रकाश, अंडे से अंडमान, नया ज्ञानोदय, दिसंबर २०१६, पृष्ठ संख्या- २४, भारतीय ज्ञानपीठ, नयी दिल्ली
६.     शुक्ल श्रीप्रकाश, अंडे से अंडमान, नया ज्ञानोदय, दिसंबर २०१६, पृष्ठ संख्या- ३१, भारतीय ज्ञानपीठ, नयी दिल्ली
७.     शुक्ल श्रीप्रकाश, अंडे से अंडमान, नया ज्ञानोदय, दिसंबर २०१६, पृष्ठ संख्या- ३३, भारतीय ज्ञानपीठ, नयी दिल्ली
८.     शुक्ल श्रीप्रकाश, अंडे से अंडमान, नया ज्ञानोदय, दिसंबर २०१६, पृष्ठ संख्या- ४२, भारतीय ज्ञानपीठ, नयी दिल्ली
९.     ग़ालिब, मिर्ज़ा असदुल्लाह खां, दीवान-ए-ग़ालिब, पृष्ठ संख्या- ११३, राजकमल प्रकाशन, नयी दिल्ली

2 comments:

  1. आपने बहुत अच्छा लिखा है मंगलम भाई। कोशिश करूँगा कि मैं भी संस्मरण पढ़ सकूँ।

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  2. बहुत अच्छा लिखा है मंगलम। आज नया ज्ञानोदय ले कर आया हूँ । इस यात्रा संस्मरण में एक और यात्रा होगी वह आपके कई सारे सवालों के साथ। एक बढ़िया समीक्षा के लिए आपको बहुत-बहुत बधाई...

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