अमरकांत की कहानी "केले, पैसे और मूँगफली"
अमरकांत की यह कहानी मध्यवर्गीय स्वप्न और संघर्ष की कहानी है. आइए पढ़ते हैं...
(मॉडरेटर)
केले, पैसे और मूँगफली
पहली तारीख के रोज पूर्व आनन्दमोहन असाधारण रूप से उत्साहित हो उठा था। दिन के तीन बजे थे और उसका लड़का राजीव मार खाने के बाद रोते-राते सो चुका था। कई दिनों की बदली के बाद आसमान साफ हो गया था, आँगन की धूप हट कर दीवार पर चली गयी थी और पास की गली से दो लड़ती हुई औरतों की चीख-चिल्लाहट कभी-कभी सुनाई पड़ने के अलावा, मुहल्ले भर में अपेक्षाकृत शान्ति थी।
महीना खत्म होते-होते पैसा या राशन होना कोई आश्चर्य की बात नहीं थी। आनन्दमोहन 'राष्ट्रीय अग्रदूत' नामक स्थानीय दैनिक समाचार पत्र में उप-सम्पादक के पद पर कार्य करता था और उसको नब्बे रुपये वेतन मिलता था। उस दिन घर में एक पैसा नहीं था और किसी तरह उधार लेकर नमक और तरकारी खरीदने के बाद खाना बना, यह एक बात थी, पर जब भोजनोपरान्त केला बेचने वाला, 'केला मलाई' कह-कह कर गली भर में फेरी लगाने लगा और राजीव केला खरीदने के लिए जिद्द करने लगा, तो इसका कोई जवाब नहीं था। फल वाला नया था, इसलिए उससे दो पैसे का एक केला उधार मिलना कठिन था, और मिल भी जाता तो उससे कहने की न किसी में हिम्मत ही थी कि और न इच्छा ही। उसकी पत्नी सुमंगला ने समझाया, उसने स्वयं दलील पेश की कि वह कम तनख्वाह पाता है, और दो दिन बाद वेतन के रुपये या कल ओवरटाइम के रुपये मिल जाने पर वह केले खरीद देगा। लेकिन लड़के के दिमाग में यह दलील न घुसी और वह थोड़ी देर बाद जमीन पर लोट कर हाथ-पैर पटकने लगा। खामख्वाह आनन्दमोहन को गुस्सा आ गया और उसने लपक-कूद कर लड़के के गाल पर दो तमाचे जड़ दिये।
भोजन करने तथा अन्य छोटे-मोटे काम समाप्त करने के पश्चात् सुमंगला जब कमरे में आयी तो वह अखबार पढ़ रहा था। सुमंगला उसके पास आकर खड़ी हो गयी और सोते हुए राजीव की ओर एक क्षण देखने के पश्चात् वह मुस्कराती हुई बोली, "इतने जोर से नहीं मारना चाहिए था। आखिर है तो बच्चा ही!"
"जी हाँ, आप जैसे मारती न हों! तुम तो इसको दिन भर मारती रहती हो, और मुझसे भी जोर-जोर से, पर जहाँ मैंने थोडा मार-मूर दिया, बस काल हो गया।" आनन्दमोहन ने अखबार में मुँह गाड़े ही अनमने स्वर में उत्तर दिया।
सुमंगला ने सफाई पेश की, "अब लीजिए, आपने दूसरा ही मतलब लगा लिया। अरे, मैं वह थोड़े कह रही हूँ कि आप मारा न कीजिए। पर आपके और मेरे मारने में फर्क है न जी। आखिर मर्द का हाथ है, धीरे से चलता है तो भी जोर-से बैठता है। स्त्री कितना भी मारे, कोई बात नहीं। अब मुझे ही देखिए, जी जल उठता है तो मारना ही पड़ता है, पर कभी भी मैं उसके गाल पर नहीं मारती। फिर जिस दिन मारती हूँ, दिन भर जी छटपटाता रहता है, और जब तक रात में उसके माथे और पैर में तेल नहीं लगा लेती दिल को सन्तोष नहीं होता। अरे, लड़का है न जी, मोहल्ले भर के लड़कों को खाते-पीते देखता है तो जिद्द कर बैठता है, नहीं तो मेरा बच्चा लाखों में एक है।" अन्त में उसकी आँखें भर आयीं।
आनन्दमोहन ने उसकी बात का कोई उत्तर नहीं दिया। वह कुछ देर तक अखबार पढ़ता रहा, फिर शरीर पर से रजाई फेंक कर उठ बैठा और पत्नी से पूछ बैठा, "क्यों जी, सचमुच घर में एक पैसा भी नहीं है?"
सुमंगला अब आईने के सामने बैठ कर बाल गूँथने का उपक्रम कर रही थी। उसने पति की ओर चौंक कर देखते हुए उत्तर दिया, "पैसा रहता तो क्या मैं देती नहीं? कभी छिपा कर कुछ रखा भी है कि आज ही रखूँगी?"
"नहीं, मेरा यह तो मतलब नहीं। हो सकता है घर में कहीं पैसे हों और हमको तुमको मालूम न हो।" उसने मुस्करा कर सुमंगला की ओर तिरछी नजर से देखते हुए कहा।
सुमंगला खिलखिला कर हँस पड़ी। फिर बोली, "यह आपने खूब कही! हाँ हो सकता है, इसी घर में कहीं राजा-महाराजा का खजाना गड़ा हो और हमको पता तक न हो।"
आनन्दमोहन भी हँसते हुए बोला, "देखो भाई, मजाक नहीं। मैं सचमुच कहता हूँ। मेरा खयाल है, हम कोना-अँतरा, ट्रंक सूटकेस ठीक से झाड़-साफ कर देखें तो कुछ पैसे तो मिल ही जाएँगे। तुम चाहे जो सोचो, मेरा तो दिल कह रहा है। बोलो, क्या कह रही हो-हाँ या नहीं?"
सुमंगला ने बात का मजा लेते हुए कहा, "ढूँढूंढ़ लीजिए, मैं तो कहती हूँ, नहीं।"
आनन्दमोहन उठ खड़ा हुआ और पत्नी के पास पहुँच कर अपना दाहिना हाथ उसकी ओर बढ़ाते हुए कहा, "अच्छी बात है। मैं कहता हूँ, घर में पैसे हैं, इसी बात पर आओ बाजी लग जाय।"
सुमंगला ने स्नेहपूर्वक पति की ओर तिरछी नजर से देखते हुए व्यंग्य किया, "आह, बड़े चालाक हैं। बाजी मुफ्त की लगेगी? बताइए, कितने की बाजी लगाने को तैयार हैं?"
"अच्छा, अधिक की नहीं, दस-दस रुपये की रही। आओ, हाथ मारो।" आनन्दमोहन गम्भीर था।
सुमंगला ने उसके हाथ पर अपना हाथ मारते हुए मुस्करा कर कहा, "आपका दिल बहुत बड़ा है जी, एकदम दस रुपये पर पहुँच गये। पर याद रखिए, अगर हार गये तो दस रुपये वसूल करके चैन लूँगी। अलग से लूँगी।"
"अच्छी बात है, लेना। और हार जाओगी तो दोगी?" उसने पूछा।
"मैं क्या दे सकती हूँ, जिन्दगी भर की गुलामी लिखा लीजिएगा।" वह मुस्करा पड़ी।
"अच्छी बात है, पहले अपना ट्रंक खोलो।" आनन्दमोहन यह कहकर कमरे के एक कोने में बढ़ गया, जहाँ एक ट्रंक और सूटकेस रखे हुए थे।
सुमंगला भी बढ़ कर वहाँ पहुँच गयी और नीचे बैठ कर साड़ी के खूँटे में बँधी चाबी से ट्रंक खोल दिया। आनन्दमोहन झुक कर ट्रंक में से एक-एक चीज निकाल कर ढूँढने लगा। साड़ी ब्लाउज हटाकर देखा, गहने के दो डिब्बों को खोल कर देखा, आये हुए पत्रों के पुराने लिफाफों को खोल कर देखा-कहीं कुछ नहीं था। उसने सभी चीजें यथास्थान रख दीं और सीधा खड़ा होकर पत्नी की ओर देखा तो उसने अँगूठा दिखा कर चिढ़ा दिया।
उसने 'कोई बात नहीं' कह कर अपना सूटकेस खोल डाला और उसकी
पड़ताल करने लगा।
"इसमें क्या होगा? सब रुपये तो आप मुझे दे देते हैं।" सुमंगला ने टोका।
"बस चुप रहो।" कह कर आनन्दमोहन अपने कार्य में व्यस्त हो गया। उसने सूटकेस की एक-एक चीज तथा एक-एक कोना खोज डाला, पर कुछ हो तब तो मिले। सूटकेस को बन्द कर वह फिर खड़ा हो गया। उसके माथे पर बल पड़ गये थे और उसकी मुद्रा से लगता था कि वह कुछ सोच रहा है।
"क्या बात है? दस रुपये देने की बात सोच कर चिन्ता में पड़ गये?" सुमंगला ने पूछा।
आनन्दमोहन ने उत्तर दिया, "अभी हारने की बात कहाँ आती है? सारा घर पड़ा हुआ है। लेकिन मैं सोचता हूँ, सूटकेस में से रुपये गये तो कहाँ गये ? तुमने तो नहीं निकाले ?"
"कैसे रुपये, जनाब?" सुमंगला ने चौंक कर प्रश्न किया।
आनन्दमोहन ने स्थिति पर प्रकाश डाला, "अरे भाई, जब हम अहियापुर में थे न, उस समय मैंने एक बार दो रुपये अपने सूटकेस में डाल दिये थे। मुझे खूब अच्छी तरह याद है कि तब से मैंने रुपये निकाले ही नहीं, कभी याद ही नहीं पड़ा। फिर वे रुपये कहाँ उड़ गये?"
दो वर्ष पूर्व आनन्दमोहन अहियापुर में रहता था, लेकिन वहाँ का मकान रद्दी और महँगा था, इसलिए बैरहने में अच्छा और सस्ता मकान मिलने पर छोड़ दिया और यहीं पर आकर रहने लगा।
उसकी बात पर सुमंगला अचम्भे से लगभग चीखती हुई बोली, "वाह वाह, आप बड़े भुलक्कड़ हैं जी। आपको याद नहीं? हम सब सिनेमा देखना चाहते थे, पर पैसे कुछ कम पड़ रहे थे, तो आपने सूटकेस में से दो रुपये निकाले थे। आप इतनी जल्दी भूल गये, पर मुझे तो सबकुछ याद है। बाप रे, मैं तो डर गयी थी कि पता नहीं, आप किस रुपये की बात कर रहे हैं।"
अब आनन्दमोहन को सबकुछ याद पड़ गया। रुपये उसने सचमुच निकाले थे। उसे दो वर्ष पूर्व रुपये निकालने पर आज बड़ा अफसोस हुआ। काश, वे रुपये न निकाले गये होते तो आज कितना मजा आता !
परन्तु उसने हिम्मत नहीं हारी और पुनः उत्साहपूर्ण स्वर में बोला, "अच्छा, कोई चिन्ता की बात नहीं, अब इस पटनी को देखूँगा, इस पर जरूर कुछ-न-कुछ होगा।"
"अरे भाई, इस पटनी पर एक कानी कौड़ी भी न होगी, मेरा कहना मानिए।" सुमंगला ने मना किया।
"तुम क्या जानो जी, बस चुपचाप खड़ी तमाशा देखो।"
कुछ ऊँचाई पर एक लम्बी पटनी बनी हुई थी और आनन्दमोहन कभी-कभी मौज में आकर उस पर चार-छः आने पैसे फेंक दिया करता था, जिससे संकटकाल में उस पर से पैसे लिये जा सकें। उसे उम्मीद थी कि कहीं-न-कहीं पर एकन्नी या दुअन्नी अवश्य पड़ी होगी।
उसने अपनी खाट पर का बिस्तर लपेट कर बगल में पड़ी कुर्सी पर रख दिया, खाट खड़ी कर दी, और स्टूल के सहारे खाट पर चढ़कर खड़ा हो गया और ऊँट की तरह सिर उचका-उचका कर पटनी पर इधर-उधर देखने लगा। कहीं कुछ नहीं था। निराश होकर वह उतरने लगा कि उसका एक पैर चारपाई की पाठी से बिछल गया। उसने अपने को गिरने से बचाने के लिए पटनी के किनारे को पकड़ने की कोशिश की, जिसमें सफल वह अवश्य हुआ, पर उसका दाहिना हाथ पटनी के किनारे से घिस कर छिल गया और खून निकल आया।
नीचे उतरा तो उसके हाथ की ओर देख कर सुमंगला चिन्तातुर स्वर में बोली, "भाड़ में जाय पैसा। आपको भी जब जिद सवार होती है तो किसी की नहीं सुनते। बार-बार कह रही हूँ, उस पर कुछ नहीं है, कुछ नहीं है, लेकिन आप तो तुल गये कम्पोजीटर भी उसके इस अप्रत्याशित शिष्टाचार से इतना प्रभावित हुआ कि चबूतरे से नीचे उतर कर हाल-चाल पूछने लगा।
आनन्दमोहन ने कम्पोजीटर से आँखें चुराते हुए स्थिति पर प्रकाश डाला, "क्या करूँ, कभी बेगारी भी करनी पड़ती है। हमारे दफ्तर के जोशी जी हैं न, उनको एक लेख लिखना है। उन्होंने अपने अखबार तो बेच दिये हैं, लेकिन लेख के लिए उनको पन्द्रह-बीस दिन पुराने अखबार की जरूरत पड़ गयी। उन्होंने मुझसे कहा था और सौभाग्य से पुराने अखबार मेरे पास थे। वही देने जा रहा हूँ। अच्छा चलूँ, देर हो रही है।"
उसने पहले ही हाथ उठा कर नमस्ते किया और फिर मूर्ख की तरह मुस्करा कर जब साइकिल पर चढ़ गया तो अपने व्यवहार पर इतना लज्जित हुआ कि साइकिल काफी तेजी से चलाने लगा।
रास्ते भर उसे डर लगा रहा कि कोई जान-पहचानी बीच में रोक न ले।
बहादुरगंज के पास उसे लगा कि उसका मित्र कमलेश 'अरे सुनो यार' कह कर पुकार रहा है। उसने घूम कर देखा तो उसको अत्यन्त सन्तोष हुआ, क्योंकि वह कमलेश नहीं बल्कि एक दूसरा लड़का था, जो कुछ दूर पर जाते हुए अपने किसी मित्र को बुला रहा था।
कुछ देर में वह चौक पहुँच गया। अब उसके सामने समस्या उपस्थित हुई कि आखिर अखबार बेचे जाएँ तो कहाँ बेचे जाएँ। वह पंसारियों की दुकानों के इर्द-गिर्द चक्कर काटने लगा। पर उसकी हिम्मत न हुई। वहाँ बड़ी-बड़ी दुकानें थीं और सबके यहाँ अच्छी-खासी भीड़ लगी हुई थी। वह उनके बीच जाकर कैसे कहे कि आधा सेर अखबार ले लो? बड़ी-बड़ी दुकाने हैं, अगर दुकानदार ने लेने से इंकार कर दिया तो ? उसकी हालत चोर की-सी हो रही थी और वह डर के मारे किसी व्यक्ति की तरफ देखता तक नहीं था। उसके दिल की परेशानी बढ़ती गयी और एक तो उसे ऐसी इच्छा होने लगी कि वह किसी ट्रक के नीचे आ जाता तो अच्छा होता। लेकिन इस भयंकर विचार के आने के फौरन बाद ही उसका हृदय एक जबरदस्त विद्रोह से भर गया। उसका कोई क्या कर लेगा! वह किसी से भिक्षा माँगने तो नहीं जा रहा! वह अपने अखबार बेचना चाहता है और यदि उससे एक भी पैसा मिलता है तो उसमें शर्म की कौन-सी बात है?
वह अपने हृदय से समस्त सन्देह, भय एवं लज्जा को हटा कर एक दुकान पर एकत्रित ग्राहकों की भीड़ के पछे खड़ा हो गया। लेकिन अभी खड़ा ही हुआ था कि पीछे से किसी ने उसकी पीठ पर हाथ मारा। उसका हृदय धक-से कर गया और उसने पीछे घूम कर देखा। उसका एक पुराना मित्र था, जिससे पिछले डेढ़-दो साल से कभी भेंट नहीं हुई थी। उसका नाम वेदव्रत था और विश्वविद्यालय में वह उसके साथ पढ़ता था। अब वह वहीं टेलीफोन ऑपरेटर था।
वेदव्रत ने मुस्कराते हुए पूछा, "कहाँ रहते हो, दोस्त? इसी शहर में रहते हो पर मुलाकात नहीं होती। मैं कभी से तुमको देख रहा था, एक बार बुलाया भी, पर हुजूर तो कहीं दूसरी जगह गुम थे। खरीद-फरोख्त हो रही है क्या?"
आनन्दमोहन ने अपना अता-पता बताने के बाद कहा, "अरे यार, घर-गृहस्थी का मामला, एक मिनट की फुरसत नहीं। श्रीमतीजी सबेरे से ही शोर मचा रही थीं कि मसाले नहीं है। मैंने भी कहा, चलो भाई, पेटीकोट गवर्नमेंट है, काम से निबट लूँ, नहीं तो खतरा हो जाएगा।" उसने जोर का ठहाका लगाया और उसका मुँह लाल हो गया।
वेदव्रत ने भी अपनी गृहस्थी का रोना रोने तथा आनन्दमोहन को कभी अपने घर
आने का निमन्त्रण देने के पश्चात् मुस्कराते हुए कहा, "अरे भाई, सीधे का जमाना नहीं है, आगे घुसो।"
"यार फेहरिस्त जरा लम्बी है। सोचता हूँ, भीड़ छँटे तो जमूँ। कोई बात नहीं, तुम्हीं बढ़ो।"
वह इतने ही से नहीं माना, बल्कि वेदव्रत की पीठ पर हाथ रख कर उसको आगे ठेल दिया। वेदव्रत ने भी उसके स्नेहपूर्ण हठ के सामने आत्म-समर्पण कर दिया और मुस्कराता हुआ आगे बढ़ गया।
आनन्दमोहन के कान जल रहे थे, जैसे किसी ने ऐंठ दिये हों। वेदव्रत के भीड़ में गायब हो जाने से उसे अप्रत्याशित सन्तोष हुआ और कुछ देर बाद ही साइकिल घुमा कर चुपके से वहाँ से चोर की भाँति हट आया। वह दुकान से काफी दूर चला गया और तब उसे एक नया विचार सूझा। जब वह अहियापुर में रहता था तो उसके मकान से कुछ ही दूरी पर एक पंसारी की दुकान थी। उस दुकानदार में एक खास बात यह थी कि वह काफी शरीफ था। वह उसी के यहाँ चीजें खरीदता और कभी-
कभी उधार भी चलता। क्यों न वहीं चलें! इस विचार से उसे बड़ी खुशी हुई, जैसे किसी ने उसे बहुत भारी संकट से उबार लिया हो। उसने आगे कुछ नहीं सोचा, बल्कि झट्-से साइकिल पर चढ़ कर अहियापुर के लिए रवाना हो गया।
जब वह दुकान पर पहुँचा तो दो-तीन आदमी कुछ खरीद रहे थे। वह साइकिल से उतर कर उन लोगों के जाने की प्रतीक्षा करता रहा और जब भीड़ साफ हो गयी तो वह आगे गढ़ गया।
दुकानदार ने उसको देख कर पहचान लिया और शिष्टतापूर्वक मुस्कराते हुए प्रश्न किया, "कहिए बाबूजी, आजकल कहाँ रहते हैं?"
आनन्दमोहन ने सन्तोष के साथ हँसते हुए कहा, "रहता तो अब बैरहने में हूँ। कल्याणी पर एक दोस्त रहते हैं। कुछ दिन पहले एक लेख लिखने के लिए उन्होंने कुछ पिछली तारीखों के अखबार माँगे थे। आज जब उनके यहाँ गया तो उन्होंने अखबार वापस कर दिये। मैं ले तो नहीं जाना चाहता था, पर उन्होंने कहा, ले के जाओ यार, यहीं पड़े रह कर क्या होंगे। उन्हीं दोस्त के यहाँ से आ रहा हूँ। तुम्हारी दुकान से जब गुजरा तो खयाल आया कि क्यों नहीं अखबार यहीं बेच दूँ? अखबार के दफ्तर में काम करने से सारे घर में अखबार छितरे पड़े हैं। अब इन अखबारों को घर ले जाने से गन्दगी और बढ़ती ही। लड़के फाड़-फूड़ कर इधर-उधर फैला-फैलू देते हैं। वैसे अखबार अधिक तो नहीं है, पर खैर। देखना तो ये कितने के होंगे।" वह धड़ल्ले से इतनी बात इस तरह कह गया, जैसे रट कर आया हो, और अन्त में वह अस्वाभाविक रूप से हँस पड़ा।
पंसारी ने बिना किसी दिलचस्पी के उसके हाथ से अखबारों का झोला ले लिया और उसमें से अखबार निकाल कर तौलने लगा। कार्य समाप्त कर उसने गली की दूसरी ओर देखते हुए बताया, "अखबार तो आधा सेर से कुछ कम ही पड़ेगा, जाइए पाँच आने ले लीजिएगा।"
आनन्दमोहन को अत्यधिक सन्तोष हुआ कि पाँच आने पैसे तो मिले सही, यद्यपि उसे मालूम था कि उस समय अखबार एक रुपया सेर के हिसाब से बिकते थे।
उसने हँसते हुए कहा, "ठीक है, कोई बात नहीं, पर बहुत सस्ता ले रहे हो, भाई। पाँच आने तो बहुत कम हैं।"
"कम तो नहीं बाबूजी, आप कहीं चले जाइए, दस आने सेर से एक पाई भी अधिक नहीं मिलेगा। अच्छा, आप पुराने ग्राहक हैं, एक आना और ले लीजिएगा।"
आनन्दमोहन ने खुशी-खुशी मान लिया और छह आने पैसे लेकर वहाँ से चलता बना। वह बड़ा प्रसन्न था। अब साइकिल पर चढ़ कर गुनगुनाता हुआ चौक की तरफ जा रहा था। छह आने पैसे जेब में रहने से उसे बड़ा सन्तोष था और उसके हृदय में एक ऐसा उत्साह था, जो समा नहीं पा रहा था। वह लड़के के लिए कुछ-न-कुछ खरीद सकता था और दुकान से सिगरेट लेकर कश लगा सकता था। अन्त में उसकी प्रसन्नता इस हद तक पहुँची कि उसकी इच्छा करने लगी कि उसकी साइकिल पंक्चर हो जाये और वह दो आने में किसी दुकान से पंक्चर बनवा ले।
चौक पहुँच कर उसने तीन आने के आधा दर्जन केले और बिस्कुट की दुकान से छह पैसे के छोटे-छोटे बिस्कुट खरीदे तथा पान की दुकान पर जा कर एक आने की दो कैंची सिगरेटें लीं। एक सिगरेट तो वहीं सुलगा ली और दूसरी जेब के हवाले की। अब उसके दो पैसे बच रहे थे, उसने उसको कोट की भीतरी जेब में सँभाल कर रख लिया कि कभी सिगरेट की इच्छा होगी तो खरीद कर पिएगा। लेकिन कुछ दूर आगे बढ़ने पर उसे खयाल आया कि उसकी पत्नी को मूँगफली बेहद पसन्द है। उसे अफसोस होने लगा कि उसने दो पैसे और क्यों नहीं बचा लिये जिससे वह एक आने की मूँगफली खरीद सकता। दो पैसे की दस-बारह मूँगफलियाँ मिलेंगी और अचानक एक विचार से उसका दिल एक जबरदस्त खुशी से भर गया और उसे गुदगुदी-सी होने लगी। वह मन-ही-मन हँस पड़ा। अब वह एक ऐसे खोमचे वाले की तलाश करने लगा, जो गरीब और बेचारा मालूम पडे और जिसके यहाँ कोई ग्राहक न हो। कुछ दूर जाने पर उसकी इच्छा पूरी भी हई और एक पेड के नीचे एक
आदर्श खोमचे वाले को देख कर उतर पड़ा और उससे दो पैसे की मूँगफली ले ली। मैगफलियाँ मुट्ठी में फैला कर उसने देखी. फिर उनको जेब में रख कर मन्द मन्द मुस्करा पड़ा।
स्वजब वह घर पहुँचा तो शाम हो चली थी और उसकी पत्नी बाहर के दरवाजे पर खड़ी सिर उचका-उचका कर गली को उत्सुकतापूर्वक निहार रही थी। वह पति को देख कर खुश हो गयी और अन्दर चली गयी।
आनन्दमोहन चुपचाप अपनी साइकिल चढ़ा कर जब भीतर के कमरे में पहुँचा तो राजीव जमीन पर बैठा दिन का बचा दाल-भात खा रहा था। उसने साइकिल आँगन में खड़ी कर दी और फिर कमरे में जाकर झोले में से केले निकाल कर राजीव को दिखलाते हुए मुस्करा कर पूछा, "कहो भाई, कितने केले लोगे?"
लड़के की आँखें आधा दर्जन केले देख कर चमक उठीं। उसने उत्तर दिया, "दो लूँगा।"
"अच्छा भई, तुम सभी ले लो और यह बिस्कुट भी ले लो।"
उसने यह कह कर बिस्कुट का पैकेट भी निकाल कर दिखलाया। राजीव खाना छोड़ कर उठ खड़ा हुआ तो सुमंगला ने उसे मना करते हुए कहा कि वह पूरा खाना खा ले और तब केले और बिस्कुट ले। बात लड़के की समझ में आ गयी और उसने कहना मान लिया।
अब दोनों पति-पत्नी एक-दूसरे की ओर देख कर हँस पड़े, एक ऐसी हँसी जैसे वह जानते हों कि ऐसी स्थिति में उनको हँसना ही चाहिए और अब काफी मजाक हो चुका है।
आनन्दमोहन ने जान-बूझ कर छेड़ा, "आखिर मेरी जीत हुई न! पैसे ला कर ही मैंने चैन लिया। अब नहीं कहोगी न!"
सुमंगला हँसती हुई बोली, "हाँ भाई, हैं तो आप पूरे ! पर आपकी जीत कैसे हुई? मैं इस तरह नहीं छोडूंगी, घर में तो पैसे नहीं मिले न? दस रुपये वसूल करूँगी आपसे, यह समझ लीजिए।"
"अच्छा, दस रुपये लोगी न कि जान खाओगी? अभी लो। पहले ही से इन्तजाम करके लाया हूँ।" उसने गम्भीरतापूर्वक कहा।
"लाइए।" कह कर सुमंगला ने अपना दाहिना हाथ फैला दिया। आनन्दमोहन ने जेब में हाथ डाल कर दो पैसे की खरीदी सारी मूँगफली निकाल ली और उसमें से पूरी दस लेकर सुमंगला के हाथ पर रखते हुए बोला, "लो अपने दस रुपये। गिन लो, पूरे दस हैं।"
इतना कह कर वह जोर से हँस पड़ा, सुमंगला ने मुस्कराते हुए स्नेह से एक क्षण अपने पति की आँखों में देखा, और फिर एक मूँगफली को जोकर की भाँति मुँह करके दाँत से फोड़ कर बोली, "हाँ जी, ये दस रुपये की नहीं, मेरे लिए तो दस हजार रुपये की हैं।"


