आज 'ज्योति तिवारी' की कुछ कवितायेँ साझा कर रहा हूँ । ज्योति काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की युवा रचनात्मकता की नयी पौध हैं । इनकी कविताओं में स्त्री स्वर बहुत ही सूक्ष्मता से अभिव्यक्त हुआ है । ज्योति ने बहुत ही कम समय में हिंदी कविता के रकबे में प्रवेश कर अपनी मुकम्मल पहचान बनाई है । इस ब्लॉग पर उनके लेखनी का स्वागत है । ज़ाहिर बात है वे नियमित यहाँ आवाजाही करेंगी । उनके निरंतर रचनारत जीवन की मंगलकामनाओं के साथ उनकी कुछ कवितायेँ...(मॉडरेटर)
अधेड प्रेमिका....
अधेड प्रेमिका थी वह
एक नौजवान की।
जैसे गौरैया का प्रेमी
मेरे गांव का बूढा बरगद।
उनका साथ कुछ यूं था
जैसे खंडहर में उगा
कोई शिशु पीपल।
वह बेहद खूबसूरत होती
जब प्रेमी के साथ होती
जैसे प्रिय पुराने दुपट्टे पर
लगा नया गोटा।
बोझिल था उसका चेहरा
उम्र की परछाइयों से
फिर भी आंखों में
प्रेमिल जुगूनुओं की
टिमटिमाहट थी।
प्रेमी के मुलायम स्पर्श की गवाह थी
उसकी खुरदुरी हथेलियां।
थिरकता था उसके घर का हर कोना
प्रेम के जादुई पदचाप से।
उसकी मुस्कान वजनदार थी
क्योंकि मालकिन थी वह
रंगीनियत के खजाने की।
थोडा प्यार,थोडी ममता
थोडा सौन्दर्य,थोडी नाजुकता
भरी हुई थी उसके भीतर।
आदर्श तालमेल था
नवीनता और पुरातनता के मध्य
इसलिए उनका साथ
एक खरा आईना था
अतीत और भविष्य का।
ज्योति तिवारी
वह दूसरी औरत.....
वह दूसरी औरत
लूटा देती है
अपनी सारी उम्मीद
भरोसा,संवेदना और प्यार
अपने प्रेमी पर।
बावजूद की छुपा दी जाती है
उसकी पहचान
बेइज्जती के डर से।
हकदार है उसका प्रेमी
सेक्स व शरीर का
बावजूद की शून्य है वह
प्रेमी की जिन्दगी में।
नहीं देखा किसी ने उसे
घूमते,शॉपिंग करते
या प्रेमी के कंधे पर सिर रख
घंटो बतियाते...
किसी पार्क के कोने में।
नहीं चाहा उसने
प्रेमी से इतना समय कि
बाधित हो प्रेमी की स्वतंत्रता।
मिटे ना उसका खुद का वजूद
इसलिए नहीं रखी इच्छा की
जुडा रहे उसके नाम के साथ
प्रेमी का नाम।
अब ढुलका देती है वह
अपना अपमान व गुस्सा
अपनी कविता में
क्योंकि नहीं खोलती वह
भाँवों की गांठे
प्रेमी के आगे।
फाडती है वह
डायरी के पन्ने
जिसपर लिखा होता है
प्रेमी का नाम
बना होता है दिल का चित्र।
उसके कमरे में मिलती है
खूब सारी चबायी रिफील
फैली स्याही व कागज के टुकडे।
जिनके बीच उसकी पनियाली आंखें
ढूंढती मिलती है
प्रेमी की मजबूत,कठोर छाती।
जिसमें मुंह गडा वह फफक सके
और कह सके कि
अब बन भी जाओ तुम
मेरी डायरी,मेरी कविता
मेरी भाषा,भाव व शब्द
ताकि इन्हें जीने की चाह में
तुम्हें जीना जारी रखूं।
अधेड प्रेमिका....
अधेड प्रेमिका थी वह
एक नौजवान की।
जैसे गौरैया का प्रेमी
मेरे गांव का बूढा बरगद।
उनका साथ कुछ यूं था
जैसे खंडहर में उगा
कोई शिशु पीपल।
वह बेहद खूबसूरत होती
जब प्रेमी के साथ होती
जैसे प्रिय पुराने दुपट्टे पर
लगा नया गोटा।
बोझिल था उसका चेहरा
उम्र की परछाइयों से
फिर भी आंखों में
प्रेमिल जुगूनुओं की
टिमटिमाहट थी।
प्रेमी के मुलायम स्पर्श की गवाह थी
उसकी खुरदुरी हथेलियां।
थिरकता था उसके घर का हर कोना
प्रेम के जादुई पदचाप से।
उसकी मुस्कान वजनदार थी
क्योंकि मालकिन थी वह
रंगीनियत के खजाने की।
थोडा प्यार,थोडी ममता
थोडा सौन्दर्य,थोडी नाजुकता
भरी हुई थी उसके भीतर।
आदर्श तालमेल था
नवीनता और पुरातनता के मध्य
इसलिए उनका साथ
एक खरा आईना था
अतीत और भविष्य का।
लगाव...
लगाव है तुम्हें मेरे शरीर से
और मुझे तुमसे।
महसूसते हो तुम
मेरी देह की गंध
और मैं तुम्हारी
आत्मा की तृप्ति।
करते हो तुम याद मुझे
सिर्फ स्वाद के लिए
और बिछ जाती हूँ मैं
तुम्हारे लिए।
इस डर से कि निकल ना जाओ तुम
तलाश में किसी नये स्वाद के।
बैठकर करती हूँ तुमसे बातें
सिर्फ सपनों में
जानते हुए कि
नहीं बनते कुछ सपने हकीकत।
चिन्ता है मुझे तुम्हारे सुख की
और ख्याल है तुम्हें अपने सुख का।
प्यार ज्यादा होगा जब देह सुन्दर हो
फलसफा है यह तुम्हारा
इसलिए करती हूँ मैं पूरी कोशिश
खूबसूरत दिखने की।
छोड जाते हो तुम मेरे कमरे में
चाय का एक खाली प्याला
बुझी सिगरेट के टुकडे,राख
और चुभता हुआ खालीपन।
मुस्कराते हैं मुझे देख
वे बडी निर्दयता से।
मेरे कानों तक आती है
उनकी चीखती फुसफुसाहट
कि मैं भी खाली प्याला
बुझी राख और
खालीपन का किस्सा हूँ
बिल्कुल उनकी तरह।
द्वन्द्व......
चलते हुए अजनबी भीड के बीच
रास्ते में मिलती है मुझे
घोडागाडियां लादे हुए बोझ
अपने मालिक की उम्मीदों का।
अलसाये हुए से छुट्टा साँडो का झुन्ड
लगभग बेपरवाह....।
मंदिर से आती घंटियों की आवाज
धक्कामुक्की करते लोगों का हुजूम।
दिखता है मुझे एक अजनबी सा रास्ता
जिसका अन्त एक गहरी उदासी से घिरा
नदी का सूना किनारा है।
जहाँ बैठ मैं स्वयं को
नदी से जोडने की
चेष्टा करती हूँ असफल।
पाती हूँ मैं कि
नदी की मछलियां साझेदार है
मेरी उदासी में।
नदी के ऊपर मंडराते पंक्षी
भावनायें है मेरी।
नदी में बहती वह दुर्गन्धित लाश
बोध कराती है मेरे होने का
और इस होने का बोध
उतार देता है मुझे बीच नदी में।
जहाँ धारायें गुजरती हैं मेरे ऊपर से
मैं स्वयं को खोजने और
सम्भालने के द्वन्द्व के बीच
डूबती जाती हूँ
गहरे,बहुत गहरे।
कवि परिचय : ज्योति तिवारी
सम्प्रति : फ़िलहाल कुल व्यक्ति कवि
छात्रा हिंदी विभाग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय
कवि तस्वीर से इतर अभी तस्वीरें चर्चित कवि- चित्रकार कुंवर रविन्द्र दा की है ।




अद्भुत
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