Sunday, 11 November 2018

परिधि की लाजबाब अभिव्यक्ति है : ब्लर्ड पेरिमीटेर्स


परिधि की लाजबाब अभिव्यक्ति है : ब्लर्ड पेरिमीटेर्स


रज़ा फाउंडेशन एवं इंडिया इंटरनेशनल सेंटर के संयुक्त तत्वावधान में पूर्वोत्तर भारत के कलाकारों द्वारा 27 अक्टूबर से 10 नवम्बर 2018 तक इंडिया इंटरनेशनल सेंटर के कमलादेवी काम्प्लेक्स में एक संयुक्त कला प्रदर्शनी “ब्लर्ड पेरिमीटेर्स (धुंधलाई परिधियाँ)” का आयोजन किया गया। इस प्रदर्शनी में असाम से अंकन दत्ता, अर्पिता डे, धर्मेन्द्र प्रसाद, धुर्बजित शर्मा; मणिपुर से चोबा थियम; अरुणाचल प्रदेश से कोम्पी रिबा; त्रिपुरा से मृन्मोय देबबर्मा; सिक्किम से सिसिर थापा; मिज़ोरम से थलाना बज़िक; नागालैंड से थ्रोंगकिउबा यिम्चुन्ग्रू और मेघालय से त्रेइबोर मावलोंग ने भाग लिया। यह कला प्रदर्शनी वहीदा अहमद के प्रयासों से संभव हो पाया, उन्होंने इसे क्युरेट किया।

यह कला प्रदर्शनी उत्तर-पूर्व की क्षेत्रीयता और उसकी सामाजिक-सांस्कृतिक जन-जीवन के विविध आयामों से हमारा परिचय कराती हैं। असाम, मणिपुर, अरुणाचल प्रदेश, त्रिपुरा, सिक्किम, मिज़ोरम, नागालैंड और मेघालय अभिव्यक्ति, बहुलता और सांस्कृतिक गतिविधियों में सम्पन्न प्रदेश होते हुए भी कला प्रदेश का अलक्षित या कम चर्चित प्रदेश है। पूर्वोत्तर का कला वैविध्य और वैशिष्टय कई मामलों में हमारे सहज कला आस्वादन का हिस्सा नहीं रहा, और इस कारण भी यह अलोकप्रिय अथवा कलागत हाशिए की स्थिति को प्राप्त होता रहा। देश की राजधानी में आयोजित यह प्रदर्शनी निःसंदेह इस रूढ़ मानसिकता, कलागत हठधर्मिता, सहज ग्राह्यता एवं कूपमंडूकता को चुनौती देते हुए इन विशिष्ट कलाओं के सहज आस्वादन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। कला माध्यमों में रतन थियम के रंगमच और उसमें विद्रोह के भिन्न रूपों से परिवर्तन के स्तर पर किये गए बदलावों से हम परिचित हैं, किन्तु प्रदर्शन कलाओं के अन्य माध्यमों से हमारा परिचय होना शेष है। ‘धुंधलाई परिधियाँ’ इस अपरिचय की चुप्पी को तोड़ने में कामयाब हुई है। बांस, बेंत, पुआल, माटी, लकड़ी, कपड़े, चटाई, टीन, विविध रंगों के साथ-साथ डिजिटल माध्यम और भाषिक सम्प्रेषण की सहायता से प्रदर्शनी को अभिव्यक्ति मिली है, जो पूर्वोत्तर के जनजीवन हमारा नजदीकी और सूक्ष्म परिचय कराती हैं। असमिया के कवि निलिम कुमार की कविता का होना अन्य कला माध्यमों के अंतर्संबंध को व्यक्त करती हैं। भले ही यह प्रदर्शनी सीमारेखा की हो लेकिन उसकी सांस्कृतिक एकता और सहमेल को बहुत ही सूक्ष्म स्तर पर रेखांकित कर जाती है। कविता और कला की यह जुगलबंदी पूर्वोत्तर की सांकृतिक एका का सदेह प्रमाण है। इस संयुक्त कला प्रदर्शनी में परम्परा और आधुनिकता का उचित सहमेल देखने को मिलता है। पूर्वोत्तर की संस्कृति अपने बहुलार्थता में आधुनिकता के रचाव और परम्परा के विलयन की संस्कृति है।

अंकन दत्ता की प्रस्तुति लोक संस्कृति और आधुनिक प्रतीकों के सहमेल से एक सांकेतिक कृति का निर्माण करती है। उनके कलाओं में आसाम के धूआँसार के साथ-साथ मिट्टी का काम और उसमें असाम आन्दोलन के आधुनिक प्रतीक उन्हें विलक्षण तो बनाते हैं साथ में कला के आधुनिकतावादी रूप को भी प्रस्तुत करते हैं। इनके कला माध्यम में सामाजिक अन्याय, राजनैतिक शक्ति-संरचना का प्रतिलोम, मनोवैज्ञानिक द्वंद्व और संघर्ष की अभिव्यक्ति अपने गहरे निहितार्थों के साथ अभिव्यक्त हुई हैं।

अर्पिता डे ने अपनी प्रस्तुति में स्त्रीमन की अभिव्यक्ति को अभिव्यक्त किया है। इनकी कलाओं में स्त्री छवि की विविध आयामों के साथ फैब्रिक रंगों और धागों का बुनवट है। स्त्री मन की संस्कृति की विविधताओं की पहचान इनकी कला को विशेष बनाता है, जहाँ पुरुष वर्चस्व का  प्रतिलोम इनकी कृति रचती है।

धर्मेन्द्र प्रसाद की कलाएँ कपडे, मिट्टी के साथ-साथ बिहार की लोक-कला चौक की आकृतियों पर चारकोल के सहमेल से निर्मित होकर दो विविध संस्कृतियों का सामंजस्य बिठाती हैं। इनकी कलाओं में विस्थापन और पहचान के संकटों का सूक्ष्म प्रवेश इनकी कला को विशेष बनाती हैं। पुआल और डिजिटल माध्यम का प्रयोग धर्मेन्द्र प्रसाद की कलाओं का एक विशेष पक्ष निर्मित करने में सहायक है।

त्रेइबोर मावलोंग की कलाओं में दिनचर्या के विविध पक्षों के साथ-साथ जीवाशारत मनुष्य, अपने आसपास खुशियों को तलाशता मनुष्य मौजूद है। इनकी कलाओं में मुख्यधारा से पहचान की संकटों से जूझता पूर्वोत्तर-मानुषों, विकास के हाशिए पर रखे गये पूर्वोत्तर के जन और सांकृतिक अलगाव के शिकार पूर्वोत्तर के समुदाय का कलात्मक निर्मिती एक अहम किरदार के रूप में आता है।

सिसिर थापा की कलाओं में लकड़ी और उससे निर्मित आकृतियों के लिए काफी महत्त्व की जगह है। बहुत ही सामान्य तरीके से अपनी आकृतियों से स्मृति और उसके गहरे निहितार्थों को रेखांकित करते हैं।

थलाना बज़िक का प्रिय रंग काला है। वे अपनी कलाओं में बॉर्डर और अलगाव को अभिव्यक्ति देते हैं। अंधकार, डर और रहस्य उनकी कलाओं में विभिन्न स्तरों के साथ प्रकाशित होता है।

मृन्मोय देबबर्मा की कलाओं में प्रमुखता से हिंसा का प्रतिपक्ष मौजूद है। ये हिंसा को एक विट और ह्यूमर के साथ प्रस्तुत करते हैं। मृन्मोय की कलाओं का अहम तत्व फैंटेसी है, जहाँ हिंसा के प्रतीक चिन्हों के साथ वे अपनी कला को विकसित करते हैं।

थ्रोंगकिउबा यिम्चुन्ग्रू विविध स्तरों पर विविध रंग-संयोजन के साथ निर्माण की वस्तुओं के सहमेल से अपनी कला को विस्तार देते हैं। इनकी कलाओं पर शांतिनिकेतन का गहरा प्रभाव लक्षित किया जा सकता है। इनकी कलाओं में श्रम और संगीत की जगह एक साथ है। इनकी कलाओं में दर्शकों के लिए कल्पना और यथार्थ के विभेद के लिए पर्याप्त जगह है।

कोम्पी रिबा की रचनाएँ जितनी सहज है उसका अभिधार्थ उतना ही कठिन है। रेखाओं के साथ वे अपनी कृति का निर्माण करती हैं, जिनमें एक गति, क्रम-भंग और कला का लय मौजूद है। इसके माध्यम से वे अपनी क्षेत्रीयता के लोक कलाओं का पुनर्निर्माण करती हैं। इनकी कला में आदिवासी रंगों की प्रमुख जगह है।


चोबा थियम की कलाओं का प्रमुख विषय मानव शरीर है। वे शरीर के साथ प्रकृति के रागात्मक सम्बन्धों को रेखांकित करने वाले कलाकार हैं। इनकी कलाओं में व्यक्ति की मौजूदगी इन्हें अन्य कलाकारों से विशेष बनाता है।

दुर्बजित शर्मा की कलाओं में मानचित्र, क्षेत्रीय कपडे के अतिरिक्त रंगों का गहरा समायोजन देखने को मिलता है। दुर्बजित की कलाओं में असाम के संघर्षों का प्रतीक रूपायित होता है। इसके साथ ही इनकी कलाओं में आमफहम की वह दृष्टि भी रेखांकित होती है जो पूर्वोत्तर को देखने का ढंग है। वे पूर्वोत्तर के प्रति आमफहम जनमानस में विन्यस्त उस दृष्टि का प्रतिलोम रच मौज-मस्ती, सैर-सपाटे और हाशिए की जगह के मिथक को अपनी कलाओं से तोड़ने का प्रयास करते हैं। इनकी कृतियों में अलगाव के दर्द के प्रति संवेदना और दंगों के प्रति आक्रोश मुख्य रूप से मौजूद है।

पूर्वोत्तर को लेकर अभी भी बाक़ी समाज के लोगों में एक अचरज का भाव रहता है। उनकी संस्कृति उनका रहन सहन, खान-पान आदि विषयों पर जानकारी ना होने के कारण तमाम तरह की बातें होती रहती है। यह कला प्रदर्शनी इस ‘अचरज के भाव’ के मिथक को तोड़ती है। इस कला प्रदर्शनी ने पूर्वोत्तर की तमाम सांस्कृतिक विविधताओं के बावजूद एक एका का भाव, एक सामंजस्य और सहमेल का भाव कला और कविता के सहमेल से मुख्यधारा के लोगों को ठीक-ठीक वैसे ही दिखाया है, जैसे तमाम सांकृतिक अलगाव के बावजूद पूर्वोत्तर का एक भगौलिक और सांस्कृतिक एकनिष्ठता हम देखते आयें हैं, जो उनकी स्वभाविकता है। यह कला प्रदर्शनी पूर्वोत्तर के प्रति आमफहम अवधारणा और उसके अपरिचय के पहाड़ को तोड़ने में मील का पत्थर साबित हुई है।
तस्वीर सौजन्य : मनीष 
रपट : कुमार मंगलम

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